कल दिलीप जी ने मदन मोहन की याद में 2 बहुत ख़ूबसूरत गीत सुनवाये । मदन जी का संगीत मेरे लिए यूँ भी हमेशा जानलेवा साबित होता है :) दिनों तक पूरे पूरे सी डी सुनने के बाद ही चैन आता है फिर आज कल तो बारिशें भी हैं ज़ोरदार :)…आज की तीनो ग़ज़लें एक ही मूड की हैं और साथ ही जावेद अख़्तर की एक नज़्म भी कुछ-कुछ इसी रंग में --
फिर वही शाम वही ग़म वही तन्हाई है
फ़िल्म-जहाँआरा
संगीत मदनमोहन
स्वर-तलत महमूद
रस्मे उल्फत को निभाए तो निभाए कैसे
फ़िल्म-दिल की राहें
संगीत-मदन मोहन
स्वर-लता मंगेश्कर
बोल-नक़्श लायलपुरी
होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा
फ़िल्म- हकीकत
संगीत-मदनमोहन
स्वर-भूपेन्द्र,तलत,रफ़ी,मन्ना डे
बोल-कैफ़ी आज़मी
मैं भूल जाऊँ तुम्हे
अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो
कोई ख़्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
कमबख़्त!
भुला न पाया ये वो सिलसिला
जो था ही नही
वो इक ख़याल
जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात
जो मैं कह नहीं सका तुमसे
वो एक रब्त
जो हममें कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं ।
जावेद अख़्तर
Wednesday, July 15, 2009
Saturday, July 11, 2009
चलो इक ताज महल बोएँ

मेरे फ़ितूरों की फ़ेहरिस्त का सबसे अज़ीज़ फ़ितूर… चलो इक ताजमहल बोएँ ……जिसे काफ़ी अरसा पहले पोस्ट किया था… समय बहुत गुज़र गया तब से अब तक…आज पन्ने पलटे तो लगा , बहुत सी बाते अपनी अहमियत कभी नहीं खोती……ज़रा से फेर बदल के बाद री-पोस्ट कर रही हूँ………
चलो इक ताज महल बोएँ
अभी हाथो मे जुम्बिश है
अभी सीने मे धड़कन है,
अभी खूं मे रवानी है
चलो इक ताज महल बोएँ
अभी जमुना मे पानी है
अभी पूनम सी रातें हैं
उम्र का चढ़ता दरिया है
चलो इक ताज महल बोएँ
अभी पलकों में परियाँ हैं
अधजगीं आधी रतियाँ हैं
अनकही सारी बतियाँ हैं
चलो इक ताज महल बोएँ
फसल जब लहलहाएगी
बीस-इक साल गुज़रेगें
ज़िन्दगी ढल रही होगी
दिवस अवसानमय होंगे …
अमावस की कठिन घड़ियों में
अपनी धुधलीं आँखों से…
चमकता ताज देखेंगें
तब अपना ख्वाब देखेंगे
अभी हाथों में संबल है
अभी सावन सताता है
अभी तनमन सलोना है
चलो इक ताज महल बोएँ
चित्र साभार
लेबल:
मेरे फ़ितूर
Monday, July 6, 2009
मूक भी बोले बधिर सुन ले कहीं जो
काफ़ी अरसा पहले मैने अपनी मासी श्रीमती सुधा की एक कविता पोस्ट की थी ……आज उनकी एक और कविता मौन यहाँ सहेज रही हूँ ……जिसे पढ़ने का प्रयास भी किया है मैने
मौन ध्वनि में मधुर जीवन नाद है
कहे मन और सुने मन संवाद है ।
अपेक्षित हो क्यों विजय अन्यत्र पर
दम्भ का ही दम्भ से प्रतिवाद है ॥
मौन के वे शब्द पत्रों ने कहे जो
मौन के वे अर्थ आँखों से बहे जो ।
सत्य ही व्यक्तित्व है निज आत्मा का
मूक भी बोले बधिर सुन ले कहीं जो ॥
धैर्य के निज ताप से हो द्रवित मनप्रिय
लौह का आकार चंचल हो न जाए ।
अग्नि पिघले द्र्व्य सी साहस उबल फिर
वितृष्णा का पात्र अंकित हो न जाए ॥
राख सा जो मौन दर्शित हो रहा है
संभलना अंगार कोई सो रहा है ।
रैन का यह तम नही घन के प्रलय सा
प्रात: रवि शिशु मुख जलधि में धो रहा है ॥
मौन जब सापेक्ष हो कर बोलता है
अणु जगे ब्रह्मांड सारा डोलता है ।
सुनामी का रोष विद्धुत घिर घटा से
प्रमादी अभिमान का श्रम तोड़ता है ॥
क्रूरता के वाण कुंठित हो गिरेंगे
मौन की जब ढ़ाल से आकर भिड़ेंगे ।
कोई प्रतिद्वन्दी कहाँ छल पाएगा
टूट कर सामर्थ्य अवनी पर गिरेंगे ॥
मौन के त्रिशूल से सज्जित दिशायें
बिजलियां अपमान की क्षण में पिएगें ।
खेलते मृगया क्षमा करूणा दया से
भार कन्धों से गिरा तृण में तिरेंगे ॥
साधना का बीज मेरा क्यों तेरे मन
गर्भ में विक्षिप्त हो चंचल हुआ है ।
क्यों मेरा अर्पण तुझे स्वीकृत हुआ यों
व्यग्रता जन्मी विफल उत्सव हुआ है ॥
सुधा
मौन ध्वनि में मधुर जीवन नाद है
कहे मन और सुने मन संवाद है ।
अपेक्षित हो क्यों विजय अन्यत्र पर
दम्भ का ही दम्भ से प्रतिवाद है ॥
मौन के वे शब्द पत्रों ने कहे जो
मौन के वे अर्थ आँखों से बहे जो ।
सत्य ही व्यक्तित्व है निज आत्मा का
मूक भी बोले बधिर सुन ले कहीं जो ॥
धैर्य के निज ताप से हो द्रवित मनप्रिय
लौह का आकार चंचल हो न जाए ।
अग्नि पिघले द्र्व्य सी साहस उबल फिर
वितृष्णा का पात्र अंकित हो न जाए ॥
राख सा जो मौन दर्शित हो रहा है
संभलना अंगार कोई सो रहा है ।
रैन का यह तम नही घन के प्रलय सा
प्रात: रवि शिशु मुख जलधि में धो रहा है ॥
मौन जब सापेक्ष हो कर बोलता है
अणु जगे ब्रह्मांड सारा डोलता है ।
सुनामी का रोष विद्धुत घिर घटा से
प्रमादी अभिमान का श्रम तोड़ता है ॥
क्रूरता के वाण कुंठित हो गिरेंगे
मौन की जब ढ़ाल से आकर भिड़ेंगे ।
कोई प्रतिद्वन्दी कहाँ छल पाएगा
टूट कर सामर्थ्य अवनी पर गिरेंगे ॥
मौन के त्रिशूल से सज्जित दिशायें
बिजलियां अपमान की क्षण में पिएगें ।
खेलते मृगया क्षमा करूणा दया से
भार कन्धों से गिरा तृण में तिरेंगे ॥
साधना का बीज मेरा क्यों तेरे मन
गर्भ में विक्षिप्त हो चंचल हुआ है ।
क्यों मेरा अर्पण तुझे स्वीकृत हुआ यों
व्यग्रता जन्मी विफल उत्सव हुआ है ॥
सुधा
Friday, July 3, 2009
तालकावेरी- कूर्ग-कुछ चित्र
तालकावेरी(कावेरी उदगम स्थल ) यह स्थान बंगलोर से 252 किमी की दूरी पर कूर्ग नामक खूबसूरत जगह पर स्थित है । कूर्ग मेडिकरी जिले के ब्रह्मागिरि पहडियो में कुहासे मे लिपटा एक बेहद लुभावना पर्यटन स्थल है। कूर्ग के बारे मे पूरी एक लम्बी पोस्ट फिर कभी । आज कुछ चित्र कावेरी नदी के उदगम स्थल से…वही हमें कावेरी नदी के जन्म की छोटी सी कथा भी जानने को मिली ---
अगस्त्य मुनी की पत्नी लोपमुद्रा ने विवाह के समय मुनी से यह शर्त रखी थी कि वे उनसे कभी अलग नहीं होंगे । एक दिन मुनी कनिका नदी मे स्नान करने के उद्देश्य से पत्नी लोपमुद्रा को अकेला छोड़ कर निकल गये । पति के विछोह में लोपमुद्रा ने स्वयं को कावेरी नदी मे परिणित कर लिया व मानव जाति की भलाई के लिये मैदानों में बह चलीं ।
दुख की बात यह है कि जो नदी अपने पवित्र उदगम स्थल से मानव कल्याण के लिये उतरी,राज्यों की सीमाओं में कैद होकर आपसी मनमुटाव का कारण बनी हुई है :(
कुर्ग की पहड़ियों में खिले काडुकमल के फूल-आस-पास के लोग इन्हे जंगल का कमल पुकारते है- मै इसकी जड़ साथ लायी हूँ -खिल जाए तो :)
....
पवित्र कुंड-जहाँ कावेरी का स्रोत है
कुंड से निकलकर जल सामने दूसरे चौकोर कुंड मे जाता है यहाँ लोग स्नान करते हैं(ठिठुरते हुए)
गोमुख से होता हुआ ये जल अन्तिम कुंड मे गिरता दिखता है -जहाँ से यह आगे पहाड़ियों मे बह निकलता है
इसी प्रांगण मे बहुत पुराना शिवालय भी है
कूर्ग नमी की चादर लपेटे अपने आप में एक तिलस्मी आरामगाह है जहाँ धुँध और बादल बिल्कुल नज़दीक सैरो-तफ़री करते महसूस होते हैं । इस रूमानियत को बखूबी जिया तो जा सकता है पर कैमरे की आगोश से ये अक्सर फिसल-फिसल जाए है
Thursday, July 2, 2009
कैसे-कैसे रंग दिखाये कारी रतिया
कैसे-कैसे रंग दिखाये कारी रतिया
हमको ही हमसे चुराये कारी रतिया
माया की नगरीया मे सोने की बजरीया
नाच-नाच हारी रामा बावरी गुजरिया
रह-रह नाच नचावे काली रतिया
जेह दिन अईहैं पिया के संदेसवा
उड़ जईहैं सुगना छुट जईहै देसवा
रोई-रोई हमको बताये काली रतिया
जगजीत सिंह यूँ भी बहुत पसंद हैं……उनकी लोकप्रीय ग़ज़लों के इलावा कुछ ऐसे गीत भी हैं जो ज़्यादा सुनने में नही आये । ये गीत 1983 में बनी फ़िल्म कालका का है……जिसे कम से कम मैने अभी तक नहीं सुना था…… इस की बंदिश के अनुरूप ही जगजीत सिंह ने गीत में बोल-बनाव कर ख़ूबसूरत समां बांधा है……कहीं-कहीं ठुमरी सा रंग झलकता है… गीतकार का नाम यदि किसी को पता हो तो ज़रूर बतायें--गीतकार हैं सत्यनारायण! sagar ji shukriyaa
लेबल:
जगजीत सिंह
Tuesday, June 30, 2009
इरेज़र

सुंदर थे बचपन के पेंसिलबाक्स और वे रंग बिरंगे
फूल,तितली,तारों,सितारों वाले इरेज़र्स
उनके मिटाने से मिट जाती थी सभी ग़लतियाँ
पन्ना हो जाता था दोबारा उजला-सफ़ा
उनसे उठती थी मीठी-मीठी गन्ध
जैसे सच ही तोड़ कर लाये गये हों
फलों के बाग़ीचों से…
मैने कभी उन्हे इस्तेमाल नहीं किया
गणित के उमसाए क्लास में चुपचाप
डिब्बा खोलकर सूँघती और फिर
निकाल एक सादी रबड़
हल करती सारे गलत सवाल…
सवाल मुझसे न तब हल हुए न अब
आज भी उलझ कर टटोलती हूँ गाहे-बगाहे
कि शायद बचा हो अब भी कोई एक आध टुकड़ा
………इरेज़र……
लेबल:
मेरे फ़ितूर
Saturday, June 27, 2009
धूप तो तपा गई
बारिशें ख्वाब होती जा रहीं हैं… उम्मीद कायम है…सुने संजीव अभयंकरके स्वर--उमड़-घुमड़ घन बरसे
फिर यूँ भी मन कहता है-
आओ चले दूर गाँव
जहाँ मिले ज़रा छाँव
धूप तो तपा गई
जला-जला गई पाँव…
एक पंक्ति कल कहीं सुनी-अच्छी लगी -
क्षमा की अग्नि में संदेह को जलाओ
लेबल:
संजीव अभयंकर
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